परम्परागत शुद्ध सात्विक रचकों, जड़ीबूटियों और मसालों तथा गुगुल, लोबान और कपूर जैसे सुगन्ध प्रदायक वृक्षोत्पादों का प्रयोग तो अब धूप और हवन सामग्रियों के निर्माण में
भी नहीं होता। जबकि अगरबत्तियों के निर्माण में तो इनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पहले तो अगरबत्तियाँ अगर की लकड़ी के चूर्ण और जिगेट पाउडर के घोल में चन्दन का बुरादा तथा अन्य सुगन्य प्रदायक द्रव मिलाकर तैयार की जाती थीं, परन्तु अब शायद ही कोई इस प्रकार की अगरबत्तियाँ बना रहा हो। सस्ती से लेकर महंगी तक अगरबत्तियाँ बनाने वाले निर्माता अब अपने यहाँ वास्तव में किसी भी प्रकार की अगरबत्तियों का निर्माण नहीं करते। वे बाजार में प्रति किलोग्राम की दर से बिकने वाली अगरबत्तियाँ लेकर और उन पर मनपसन्द कृत्रिम सुगंध मिश्रण चढ़ाकर अपने ब्राण्डनेम के डिब्बों में रखकर सप्लाई करते हैं। यही कारण है कि आज अगरबत्तियों के निर्माण का यह व्यवसाय दो पूर्णत: पृथक-पृथक उद्योगों का रूप ले चुका है। कुछ व्यक्ति गंधरहित अगरबत्तियों का बड़े अथवा मध्यम स्तर पर निर्माण करके उन्हें थोक बजार में बेचते हैं और दूसरे व्यक्ति बाजार से ये बनी-बनाई अगरबत्तियां लेकर उन पर सुगन्य
चढ़ाने के बाद अपना ब्राण्डनेम छपी हुई डिबियाओं में भरकर सप्लाई करते हैं। तकनीकी भाषा में इन गंधहीन अगरबत्तियों को डमी अगरबत्ती कहा जाता है और व्यावहारिक रूप में आज इनका निर्माण ही न्यूनतम पूंजी का सर्वाधिक लाभ प्रदायक उद्योग है।

प्रमुख विशेषताएँ  (Merisof the Industy

डमी अगरबत्तियों का निर्माण एक ऐसा अद्भुत उद्योग है कि कई क्विंटल अगरबत्तियाँ बनाकर सप्लाई करते समय भी इनके पैकिंग और निर्माण में किसी भी मशीन तो क्या किसी उपकरण तक का प्रयोग नहीं होता। बीड़ियों के निर्माण के समान ही यह भी श्रम पर आधारित एक ऐसा उद्योग है जिसे चन्द हजार रुपए के कुल निवेश से किसी भी गाँव, कस्बे अथवा महानगर की गरीब बस्ती या झुग्गी झोपड़ी, कॉलोनी में आसानी से प्रारंभ किया जा सकता है। मसाला मिश्रण को सामान्य पानी में आटे के समान हाथ से गूंधकर तीलियों पर यह मसाला हाथ से ही चढ़ाया जाता है। महिलाएँ और बच्चे ही नहीं बल्कि असक्त वृद्ध और नेत्रहीन व्यक्ति तक यह कार्य आसानी से कर लेते हैं। यही कारण है कि इस प्रकार  की
अगरबतियाँ बड़े स्तर पर तैयार करते समय भी आपको अपनी कार्यशाला तक की स्थापना करने की जरूरत नहीं पड़ती। घरों में मजदूरी की दर देकर यह आसानी से करवाया जा सकता है। इस प्रकार न तो आपको एक भी कर्मचारी रखना पड़ता है और न ही भवन अथवा मशीनों पर कुछ व्यय होता है। सभी रचक और तैयार बतियाँ काफी सस्ती होती हैं और मौसम से विशेष प्रभावित भी नहीं होतीं,अतः सामान्य टीन शेड में सभी माल आसानी से रखा जा सकता है।

तैयार बतियों और बाइंडर के रूप में प्रयोग किए जाने वाली वस्तुओं को भीगने तथा कच्चेमाल और तैयार बतियों का आग से बचाव ही इस उद्योग की एकमात्र सावधानी है। जहां तक लाभ प्रतिशत का प्रश्न है जितना धन आप इस उद्योग में लगाते हैं उसके आधे से लेकर बराबर तक प्रतिमाह आसानी से अर्जित कर सकते हैं। सभी रचक स्थानीय बाजार में आसानी से मिल जाते हैं, अतः आवश्यकतानुसार खरीदे जा सकते हैं। बत्तियां तैयार होने में एक दिन का समय लगता है और तैयार बत्तियां थोक बाजार में भरपूर लाभप्रद दरों पर नकद ही बिक जाती हैं। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में यह कार्य करने पर भी दस-पन्द्रह दिन के उत्पादन व्यय जितनी कार्यकारी पूंजी से

सफलतापूर्वक कार्य किया जा सकता है। क्वालिटी के अनुरूप आजकल पन्द्रह से तीस रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर ये डमी अगरबत्तियाँ थोक में बिक रही हैं,और अच्छा उत्पादक इनमें दो से पांच रुपए प्रति किलोग्राम तक शुद्ध लाभ अर्जित कर ही लेता है।

मुख्य रचक और उनके विकल्प (Rad Maturnals)

पहले तो अगर नामक मुलायम और सुगन्धित लकड़ी का बारीक चूर्ण इनका प्रमुख आधार रचक था और मैदा या जगत नामक लड़की का चूर्ण इनका प्रमुख बाइण्डर था। कर्नाटक
और दक्षिण भारत में उत्पन्न होने वाली ये दोनों लकड़ियां प्रयाप्त महंगी हैं, और यही कारण है कि अब अगर की लकड़ी के स्थान पर तो किसी भी साधारण लकड़ी के बुरादे, पेड़ों के सूखे पतों और छालों तक का प्रयोग किया जाता है। ए इनके साथ लकड़ी के भार के एक तिहाई से आधे तक लकड़ी के कोयले का प्रयोग भी इनमें होता है। वैसे तो कपास के सूखे पौधों को जलाकर तैयार किया गया कोयला सर्वश्रेष्ठ रहता है, या फिर इसके स्थान पर हल्की लकड़ियों के कोयले का प्रयोग किया जा सकता है। परन्तु जहां तक व्यावहारिकता की बात है आजकल इनमें साधारण लकड़ी के कोयले का प्रयोग तो होता ही है, पत्थर के कोयले का भी प्रयोग अनेक निर्माता करते हैं। यहाँ तक कि लकड़ी और पत्थर का कोयला रखने के स्थान पर एकत्र हो जाने वाली धूल का प्रयोग भी कुछ निर्माता करते हैं। परन्तु इसे मिलाने पर बतियाँ कुछ भरी तो
ही जाती हैं वे जलते समय प्रायः बीच-बीच में बुझ भी जाती हैं। 

आपके द्वारा तैयार की गई डमी अगरबतियाँ अन्य व्यक्ति सुगंध मिश्रण चढ़ाकर अपने नाम से इन्हें बेचते हैं। यही कारण है कि इनके निर्माण में प्रयोग किए जाने वाले राचकों की शुद्धता, उनके गुण-दोषों और गंध आदि पर तो नाममात्र का ही ध्यान दिया जाता है, मुख्य ध्यान यही रखा जाता है कि प्रयोग की जाने वाली सभी वस्तुएँ आसपास में ही भरपूर मात्रा में सस्ती दर पर मिल जाएँ। यही कारण है कि सूखे पत्ते और पेड़ों की छाल एवं पतली डण्डियाँ उपलब्ध होने पर उन्हें बारीक पीसने के बाद छानकर भी इस मिश्रण में मिला लिया जाता है। जहाँ तक लकड़ी और कोयले के पाउडरों के अनुपात का प्रश्न है, दो भाग लकड़ी के बुरादे का बारीक पाउडर और एक भाग पिसा हुआ कोयला ही प्रायः मिलाया जाता है। परन्तु जब लकड़ी के बुरादे के पाउडर के साथ पिसे हुए पत्तों, छालों और पतली टहनियों का भी प्रयोग करते हैं तब कोयले के पाउडर की मात्रा थोड़ी बढ़ा ली जाती है, क्योंकि लकड़ी के बुरादे की अपेक्षा ये वस्तुएँ शीघ्रता से जलती हैं। इसी प्रकार आप कौन-सी लकड़ियों का बुरादा प्रयोग कर रहे हैं अर्थात बुरादा पीपल और चीड़ जैसी शीघ्र ज्वलनशील लकड़ियों का है अथवा देवदार, शीशम, जामुन और साल जैसी कठिनाई से जलने वाली लकड़ियों का, या फिर आम और शहतूत जैसी मध्यम स्तरीय लकड़ियों का, इस पर भी कोयले का अनुपात निर्भर करेगा। शीघ्र ज्वलनशील लकड़ियों के साथ कुछ अधिक मात्रा में कोयले का पाउडर मिलाना पड़ता है, तो मंद गति से ज्वलनशील लकड़ियों के  साथ कुछ कम मात्रा में।
आप किसी भी फार्मूले से अगरबत्तियों का निर्माण करें सभी रचकों का मैदा जैसा बारीक पिसा हुआ होना अधिक अच्छा रहता है। यह कार्य आप किसी पल्वीलाइजर वाले से करवा सकते हैं क्योंकि अनेक व्यक्ति मजदूरी पर मसाले, दंत मंजनों के लिए कोयला और गेरू आदि पीसने का कार्य करते हैं। ग्राइण्डर और चक्की के विपरीत पल्वीलाइजर रचकों को पीसता नहीं, बल्कि तीव्रगति से भीषण चोटें मारकर तोड़ता और कूटता है, अतः इसका प्रयोग सर्वश्रेष्ठ रहता है। वैसे आप इसके स्थान पर बिजली से चलने वाले ग्राइण्डर का प्रयोग भी आसानी से कर सकते हैं, क्योंकि अगरबत्ती के रचकों का एकदम फाइन पाउडरों के रूप में पिसना अनिवार्य नहीं।

परम्परागत तथा आधुनिक बाइण्डर (Binders)

जिगेट लकड़ी का पाउडर आज कॉफी महंगा है और यही कारण है कि इसके स्थान पर कुछ समय पहले तक तो अरारोट अथवा आलू और चावल जैसे अखाद्य स्टार्चों का प्रयोग होता था। परन्तु अब तो इनके स्थान पर कैजीन अथवा एलब्यूमिन का प्रयोग ही प्रायः किया जाता है। मक्खन निकले दूध को फाड़कर केजीन (Casein) तैयार किया जाता है और डेयरी प्लाण्टों द्वारा बड़ी मात्रा में बनाए जाने के कारण काफी सस्ता भी है। सामान्य ठण्डे पानी में थोड़ा कास्टिक सोडा, कपड़े धोने का सोडा अथवा अन्य कोई क्षार मिलाने के बाद उसमें बारीक पिसा हुआ केजीन डालने पर वह स्वयं घुलकर बहुत ही अच्छे बाइण्डर का रूप ले लेता है। एलब्यूमिन (Albumin) सूखे हुए खून का ही दूसरा नाम है। पशुओं का वध करते समय जो रक्त निकलता है उसे सुखाकर ही यह एलब्यूमिन तैयार किया जाता है। आज सबसे सस्ते और मजबूत जोड़ लगाने वाले बाइंडर का रूप यह एलब्यूमिन ले चुका है।


गुणवर्द्धक एवं संरक्षक रसायन (Builders)

अगरबत्ती मन्द और एक समान गति से पूरी जले, इस प्रयोजन के लिए अगरबत्ती में कुल भार का दो-तीन प्रतिशत कलमी शोरा अर्थात साल्ट पीटर (SaltPeter) मिलाया जाता है। अगरबत्ती को समान गति में निरन्तर जलाए रखने में शोरे से भी अधिक प्रभावशाली रहा है, पोटशियम नाइट्रेट  (Potassium Nitrate) का प्रयोग। यह एक तीक्ष्ण रसायन है अत: इसे बहुत ही कम मात्रा में मिलाना ही पर्याप्त रहता है। इसी प्रकार पूरी तरह से सूखने के बाद मसाला तीली पर से झड़े नहीं, इस प्रयोजन के लिए कैल्शियम क्लोराइड, जिंक क्लोराइड जैसी मिट्टी या पानी में घोलकर कोई साबून अथवा कोई तेल या मोबिल ऑयल भी कुछ निर्माता मिलाते हैं। वैसे इस कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ रहता है यूरिया नामक रासायनिक खाद का प्रयोग। यूरिया (Urea) जहाँ अच्छा और सबसे सस्ता प्लेस्टीसाइजर है, वहीं इतना जहरीला भी है कि
तैयार बत्तियों को चूहे आदि नहीं काटते और उनमें कीड़ा भी नहीं लगता। बाइण्डर के रूप में एल्ब्यूमिन अथवा केजीन का प्रयोग करने पर एक सावधानी तो यह रखनी पड़ती है कि उसे
घोलने के चार-पाँच घण्टों के अन्दर ही प्रयोग कर लिया जाए। परन्तु सूखने के बाद भी सड़ने की प्रक्रिया रुकती नहीं, अतः एलब्यूमिन बाइण्डर बनाते समय उसके भार का 10% यूरिया फार्मेल्डीहाइड अथवा फार्मेल्डीहाइड नाम वाली अन्य कोई फिनोलिक रेजीन भी अनिवार्य रूप से मिलाई जाती है। इस उद्योग में आपकी सम्पूर्ण सफलता ही इस बात पर निर्भर करती है कि विभिन्न गुण वर्धक रसायनों का प्रयोग करते हुए आप कम-से-कम मूल्य में अच्छा बाइण्डर किस तरह तैयार करते हैं।

बांस की तीलियाँ (Bamboo Sticks)

सभी रचकों में बांस की तीलियाँ ही अभी तक नहीं बदली हैं। सबसे अधिक आठ इंच लम्बी और पतली अगरबत्तियाँ ही बिकती हैं। इनमें प्रयोग की जाने वाली तीलियाँ प्रति किलोग्राम 1500 से 1800 के मध्य चढ़ती हैं। दस और बारह इंच लंबी बत्तियां अथवा मोटी बत्तियाँ भी बनती हैं परन्तु बहुत कम। तीलियाँ खरीदते समय ध्यान रखें कि वे भार में हल्की, गांठ रहित, एकसार, सीधी, समान मोटी और पूर्णतः सूखी हों। उत्तर प्रदेश के कन्नौज नगर से मेसर्स वली मोहम्मद नबी मोहम्मद तीली वाले, कन्नौज इनके एक बड़े सप्लायर हैं। स्थानीय चिक और झाडू आदि बनाने वालों से भी ये तीलियाँ आप आसानी से खरीद सकते  हैं।

सर्वश्रेष्ठ परम्परागत डमी अगरबत्ती (Best Sticks)

फाले से बतियाँ बनाना आज संभव ही नहीं। यह तो हम इसलिए दे रहे हैं कि पहले थोड़ी सी बतियाँ आप इस फार्मूले से बनाकर रख लें, और आगे बत्तियां बनाते समय चेष्टा करें कि आपकी बत्तियाँ भार तथा अन्य गुणों में इनसे निकटतम संभव सीमा तक मिलती-जुलती बने।

       अगर लकड़ी का पाउडर (Agar Powder)   चार किलोग्राम
      जिगट का पाउडर (Jiggat Powder)।     पांच किलोग्राम
         चंदन का बुरादा (Sandawood Powder)     1.5 किलोग्राम
          ताजा पानी (Water)       आवश्यकता अनुसार

दोनों पाउडर मिलाने के बाद आटे की तरह भली प्रकार गूंथकर पिण्ड में कुछ गड्ढे बनाकार उनमें पानी भर दें। तीन-चार घण्टे में यह फूल जाता है। अब पुनः गूंथ कर अगरबत्तियाँ
बना ली जाती हैं।

व्यावहारिक श्रेष्ठ फार्मूला (Good Dummysicks)

डमी अगरबतियों का कोई निश्चित निर्धारित फार्मूला नहीं होता। इस पोस्ट का अध्ययन करने के बाद आप स्वयं बाजार की माँग और कच्चे माल की आपूर्ति के अनुसार फार्मूला सेट कर सकते हैं। वैसे बहुत ही अच्छी डमी अगरबत्तियाँ इस फार्मूले से या इसमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके तैयार की जा सकती हैं।

     लकड़ी का बुरादा (Saw Dust )     50 किलो ग्राम
     लकड़ी का कोयला (Charcoal)     25 किलो ग्राम
     कलमी शोरा (Salt Peter)             2.5 किलो ग्राम
     यूरिया नामक खाद (Urea)              1.5 किलो ग्राम
    केजीन अथवा एलब्यूमिन बाइण्डर (Binder)   20 लिटर
बाइंडर के अतिरिक्त सभी रचक फाइन पाउडर के रूप में पिसे हुए लिए जाएंगे और इन्हें अच्छी तरह एक जगह मिला कर ही आप कारीगरों को देगे। जहां तक बाइंडर का प्रश्न है निर्माण विधियों सहित चार फार्मूले नीचे दिए जा रहे हैं।

बाइण्डर का सबसे आसान फार्मूला (Easiest Formula)


सभी रचक एक जगह सूखे मिलाने के बाद चार पांच गुने सामान्य ठंडे पानी में घोलकर यह बाइडर तैयार किया जाता है। यही कारण है कि इसे सूखे रूप में भी ठेके पर काम वाले व्यक्तियों को दे सकते हैं।
      लैक्टिक केजीन पाउडर (Casein)    5 किलो ग्राम    
      कपड़े धोने का सोडा (Soda Ash)    1किलोग्राम 
      बुझा हुआ चूना (Prepeated Lime)       500 ग्राम
शायद यह कहने की तो आवश्यकता ही नहीं कि अच्छी क्वालिटी की सामान्य सफेदी की चार- छह दिन पानी में भिगोने के बाद सुखाकर और पीसकर यह बुझा हुआ चूना तैयार  किया जाता है।

कैजीन निर्मित सस्ता बाइण्डर (Cheapest Casein Binder)

केजीन का दस गुना पानी इसमें मिलाया जाता है, परन्तु पतला होने के बावजूद काफी मजबूत पकड़ होती है इस बाइण्डर की।
   लैक्टिक कैजीन पाउडर (Casein)            1.5 किलोग्राम
   मैग्नीशियम ऑक्साइड (Meg. Oxide)           150 ग्राम
   सोडियम वोरेट (Sodium Borrat)               100 ग्राम
   कपड़े धोने का सोडा (Soda Ash)               50 ग्राम
   सूखा खमीर (Yeast)                                 50 ग्राम
   ताजा पानी (Water)                                 25 लिटर
पाँच लीटर पानी में सभी रचक घोलने के बाद छानकर गुठलियां आदि फोड़ दें और सम्पूर्ण पानी मिला लें। निरन्तर चलाते हुए साठ अंश सेण्टीग्रेड(60 ०C) तापमान पर इसे पकाया जाता है। तापमान का विशेष ध्यान रखें और ताप मापने के लिए इण्डस्ट्रियल थर्मामीटर का उपयोग निरन्तर करते रहें।


स्टार्च निर्मित बाइण्डर (Starch Based Binder)

इस फार्मूले में आप मक्का, कसावा, टेप्याको स्टार्च अथवा अरारोट का प्रयोग कर सकते हैं, परन्तु आलू का स्टार्च सस्ता तो है ही अधिक पानी भी खपाता है। दोनों क्लोराइड मिलाए जाने के कारण इसमें कपड़े धोने का सोडा भी नहीं मिलाना पड़ता। दस ग्राम जिंक ऑक्साइड मिला देने पर और एअर टाइट जार या ड्रम में रखने पर तो यह हफ्तों तक खराब भी नहीं होता। परन्तु अन्य बाइण्डरों से कुछ महंगा तो पड़ता ही है।
        आलू का स्टार्च (Potato Starch)      2 किलोग्राम 
        कैलशियम क्लोराइड (CalciumChoride)     950 ग्राम
       जिक क्लोराइड (ZincChloride)             700ग्राम 
       ताजा पानी (Waler)                                17 लिटर
संपूर्ण प्रक्रिया में तापमान पैंसठ डिग्री सेण्टीग्रेड (65 ०C) ही रखना है अतः थर्मामीटर का प्रयोग आप करेंगे ही। इन दोनों फार्मूलों से बाइण्डर बनाते समय मिक्सर लगे वाटर बाथ अथवा दोहरी सतह के मिक्सर का प्रयोग अधिक अच्छा रहेगा। इनके अभाव में आप गर्म पानी की बड़ी कड़ाही में मिश्रण का भगोना रखकर भी काम चला सकते हैं। सारा पानी पैंसठ डिग्री सेल्सियस तापमान करके रख लिया जाता है। इसमें से दो लीटर पानी मिक्सर या बाथ वाटर में डालकर दोनों क्लोराइड डालकर घुलने तक चलाते रहते हैं। फिर निरन्तर चलाते हुए थोड़ा थोड़ा करके स्टार्च डालते हैं और गाढ़ा हो जाने पर थोड़ा पानी डालकर घोंटने के बाद थोड़ा थोड़ा स्टार्च डालते रहते हैं। कई बार में यह क्रिया पूर्ण की जाती है। सारा स्टार्च घुल जाने पर शेष संपूर्ण पानी डालकर निरन्तर चलाते हुए दस पन्द्रह मिनट पकाने के बाद आग से हटाकर जिंक आक्साइड या अन्य कोई जीवाणुनाशक रचक मिला देते हैं। पूरी तरह से ठण्डा हो जाने पर इसे एअर टाइट डिब्बों या जारों में आप हफ्तों के लिए रख भी सकते हैं।


एल्ब्यूमिन निर्मित बाइण्डर (Albumin Binder)

यों तो केजीन निर्मित बाइण्डर भी शीघ्र ही सड़ने लगते हैं और इसीलिए उनमें पर्याप्त मात्रा में कीटनाशक रसायन हम मिलाते हैं। परन्तु सूखा खून होने के कारण एलब्यूमिन बाइण्डरों
से बनी बत्तियों को कीड़ों से बचाने के लिए हम दस प्रतिशत यूरिया फार्मेल्डीहाइड अथवा अन्य किसी फिनोलिक रेजीन, इतना ही कास्टिक सोडा तथा पाँच प्रतिशत चीड़ वृक्ष का तेल मिलाने के लिए विवश हैं। पूरा फार्मूला इस प्रकार है -
        एलयूमिन (Albumin)          1 किलो ग्राम
        फिनोलिक रेजीन (कीटनाशक के रूप में)    100 ग्राम
        कास्टिक सोडा (Sodium Hydroxy)    100 ग्राम
        सोडियम सिलीकेट (SodiumSilicate )  200 ग्राम
        बुझा हुआ चूना HydratedLime)           85 ग्राम
        पाइन का तेल (PineOil)                       50 मिली
वाइण्डर तैयार करने के तीन-चार घण्टे पूर्व पपड़ियों वाले कास्टिक सोडे को सौ मिली लिटर पानी में घोलकर रख दिया जाता है। ढाई लीटर पानी गुनगुना अर्थात साठ डिग्री सेण्टीग्रेड
- गर्म करके मिक्सर में यह पानी, एल्ब्यूमिन तथा फिनोलिक रेजिन डालकर, आधा पाइन आयल भी डाल देते हैं। इसी मध्य बुझे हुए चूने को डेढ़ दो सौ मिलीलीटर पानी कास्टिक सोडा के बराबर ठण्डे पानी तथा सोडियम सिलीकेट को ढाई तीन सौ मिली लीटर गर्म पानी में घोलकर रख लिया जाता है। मिक्सर में घुट रहा पेस्ट अभी बहुत गाढ़ा है अत: दस बारह मिनट की घुटाई के बाद चार लीटर ठण्डा पानी और बाकी बचा पाइन आयल भी उसमें मिला देते हैं। दो-तीन मिनट की घुटाई के बाद चूने का घोल इसमें मिलाकर इसके चार मिनट
 बाद कास्टिक सोडे का घोल अर्थात 50 बामी की कास्टिक सोडे की लाई भी मिला देते हैं। तीन या चार मिनट घोंटने के बाद पानी में घुला सोडियम सिलीकेट मिलाकर पाँच-सात मिनट और घोंटने पर बाइण्डर तैयार हो जाता है।

एल्ब्यूमिन और कैजीन निर्मित ये बाइण्डर बहुत जल्द खराब होने लगते हैं, अतः तैयार होते ही प्रयोग कर लिए जाते हैं। मिक्सर तथा इन्हें बनाने और रखने के सभी पात्रों को भी तत्काल साफ करना अनिवार्य है।यदि नया लॉट या घान (Lot) बनाते समय पुराने का अंश मात्र भी लगा रह जाएगा, तब वह नया घान भी खराब हो जाएगा। बुझा हुआ चूना तैयार करने के लिए देहरादून की सफेदी को पानी में दो- तीन दिन भिगोए रखने के बाद उसके पत्थर आदि निकालकर और शेष भाग को सुखाने के बाद बारीक पीसकर रख लीजिए। जहाँ तक तैयार अगरबत्तियों को बेचने और सभी रचक व रसायन खरीदने का प्रश्न है, पुरानी दिल्ली के खारी बावली क्षेत्र में तिलक बाजार इसका प्रधान केन्द्र है। इस उद्योग के सभी पहलुओं की व्यावहारिक जानकारियाँ भी वहाँ आप आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

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