धूप अगरबत्तियाँ और हवन सामग्री बेचने वाली दुकानें तो एक होती ही हैं, अपने ब्रांडनेम से बड़े स्तर पर इन वस्तुओं का निर्माण करने वाले संस्थान भी ये तीनों वस्तुएं अपने यहां बनाते हैं। जहाँ तक व्यावहारिकता का प्रश्न है वे अगरबत्तियाँ अपने यहाँ नहीं बनाते, बल्कि बाजार से डमी अगरबत्तियाँ खरीदकर उन पर अपने यहां केवल सुगन्ध मिश्रथ चढ़ाते और डिब्बियों में पैक करते हैं। इसके विपरीत धूप की लकड़ी, रबर सोल्युशन, लकड़ियों के बूरादे मूंगफली के छिलके और कुछ गुणवर्द्धक रसायन एवं सुगन्धे मिलाकर और स्वयं मशीनों
पर घोंट पीसकर अपने यहाँ धूप तैयार करते और पैक करते हैं। कच्चेमाल से लेकर निर्माण-प्रक्रिया और पूंजीनिवेश से लेकर मशीनों की अनिवार्यता के क्षेत्र तक ये दोनों उद्योग एक-दूसरे के ठीक विरोधी हैं। सबसे बड़ा अन्तर तो यह है कि आप तैयार धूप में कितनी ही सावधानी के साथ सुगन्ध मिलाएँ, पाँच किलोग्राम धूप को घण्टे भर तक ही चाहे क्यों न कुटें, सम्पूर्ण धूप के कण-कण में वह सुगन्ध अच्छी तरह आत्मसात हो ही नहीं पाएगी। यही नहीं, तैयार धूप में तरल सुगन्ध-मिश्रण मिलाने और बहुत अधिक कूटने-पीटने के कारण वह अधिक मुलायम और चिपचिपी भी हो जाती है। यही कारण है कि रीपैकिंग करने वाले भी प्रायः बाजार से अपनी पसन्द और स्तर की तैयार सुगन्धित धूप खरीदकर अथवा अपने फार्मूले के अनुसार दूसरे निर्माता से बनवाकर उसे वांछित मात्रा में तोल-तोलकर ज्यों-का-त्यों (as-it-is) ही अपनी छपी हुई डिब्बियों में पैक करते हैं।


उद्योग का आर्थिक एवं व्यावहारिक पक्ष (Feasibility)

अगरबत्तियों के विपरीत धूप तैयार करने के लिए कम- से -कम एक ग्राइण्डर, एक तीन अथवा अधिक रोलर लगी हुई रोलर मिल तो चाहिए ही, एज रनर जैसा एकाध हेवी ड्यूटी
मिक्सर कम ग्राइण्डर भी अनिवार्य रूप से चाहिए। छोटे स्तर पर कार्य करते समय भी साठ-सत्तर वर्ग मीटर स्थान, दस हार्स पावर विद्युत और पचास हजार रुपए की मशीनें चाहिए परन्तु जहां तक व्यावहारिकता का प्रश्न है सौ डेढ़ सौ वर्गमीटर स्थान में लगभग एक लाख रुपए की मशीनें लगाकर ही इस उद्योग को अधिक लाभदायक तरीके से चलाया जा सकता है। इस स्तर पर कार्य करते समय आपको लगभग एक लाख रुपए कार्यकारी पूंजी के रूप में तो चाहिए हीं, दस से पचास हजार रुपए पैकिग हेतु डिब्बियों को बनवाने पर भी लग ही जाता है।
इस उद्योग की बड़ी विशेषता तो यह है कि जो निर्माता स्वयं धूप बनाकर अपने ब्राण्ड नेमों से इसे भरपूर मात्रा में बेचते हैं, वे भी अपना अतिरिक्त उत्पादन पाँच किलो ग्राम पिण्डों के रूप में री-पैकर्स को सप्लाई करते हैं। कारण यह है कि इनके निर्माण में कई मशीनों का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है, अतः एक छोटा निर्माता भी एक क्विटल के लगभग धूप प्रतिदिन तैयार करता ही है और अपने पैकिंग में इतनी धूप बेचने के लिए बहुत ही विस्तृत बिक्री व्यवस्था चाहिए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अगरबत्तियों के समान बहुत दूर - दूर तक धूप को भेजना सहज संभव नहीं। प्रायः स्थानीय बाजार और आसपास के नगरों में ही धूप बनाकर बेची जाती है। यही कारण है कि लगभग प्रत्येक धूप निर्माता कई सुगन्धों, विभिन्न गुणवत्ता और मूल्य श्रृंखलाओं में निर्माण करता है और अपने ब्राण्ड नेमों से छोटे पैकिंग में तो विस्तृत बिक्री व्यवस्था के साथ बेचता ही है, छोटे निर्माताओं Repackers) के लिए भी माल तैयार करता है। परन्तु यह तो कोई समस्या नहीं, ये  री-पैकर्स स्वयं आकर आपके यहाँ से माल ले जाते हैं और लगभग प्रतिदिन एक निर्धारित मात्रा में माल उठाते हैं। इस रूप में सौ से डेढ़ सौ वर्गमीटर स्थान में लाख रुपए की मशीनें और तीन-चार लाख रुपए  प्रति कार्यकारी पूंजी के रूप में लगाकर पचास हजार से एक लाख रुपए प्रति माह अर्जित करना सहज सम्भव है।

प्लाण्ट, मशीनें तथा पूंजीनिवेश (Plant and Investment)

बिना मशीनों के धूपों का निर्माण संभव ही नहीं। सूखे रचकों को पीसने के लिए एक  ग्राइण्डर या छोटा पल्चीलाइजर, बाइण्डर तैयार करने हेतु एक रोलर मिल, रबर काटने के लिए टबॉको लीफ चिपिंग मशीन अथवा हाथ की जुगाड़ और बत्तियाँ तैयार करने के लिए सेवइयां बनाने की मशीन तो अनिवार्य रूप से चाहिए ही। छह अथवा अधिक रोलर की रोलर मिल होने पर बाइण्डर में सूखे रचक मिलाकर धूप तैयार करने का कार्य भी उस पर किया जा सकता है। परन्तु व्यावहारिक रूप में इसमें एक बड़ी बाधा है। बाइण्डर तो आधे घण्टे में तैयार हो जाता है | परन्तु रोलर मिल पर बीस-पच्चीस किलोग्राम धूप का घान तैयार होने में तीन घण्टे से भी अधिक समय लगेंगे। इसके विपरीत पेण्ट और प्रिटिग इंक्स के निर्माण में काम आने वाला एज रनर नामक मिक्सर दो घण्टे में ही इतनी धूप तैयार कर देता है। एज रनर का मूल्य और बिजी ।
खपत दोनों ही छह रोलरों वाली रोलर मिल के एक तिहाई से भी कम है और यही कारण है कि लगभग सभी धूप निर्माता बाइण्डर तैयार करने के लिए रोलर मिल और धूप तैयार करने के लिए एज रनर अथवा अन्य किसी ऐसे मिक्सर का प्रयोग करते हैं जो पेस्ट को मिलाने के साथ पीसता भी रहे।
बड़े स्तर पर धुपों का निर्माण करते समय सबसे अच्छा और सस्ता सिद्ध हो सकता है तिलहनों से तेल निकालने वाले लोहे के विद्युत संचालित कोल्हू का प्रयोग। आजकल बिजली से चलने वाले तेल निकालने के ये पुराने कोल्हू कबाड़ के भाव मिल जाते हैं। पचास-साठ किलोग्राम धूप एक बार में तैयार हो जाए इतना बड़ा होता है इनमें लगा पात्र। इन कोलहूओं के
पात्र के मध्य बहुत ही भारी एक मूसली लगी होती है जो पात्र में समांतर गति से घूमती रहती है। इतना भीषण होता है मूसली का दबाव कि जब इन कोल्हुओं में सरसों, मूंगफली, तिल आदि कोई भी तिलहन भरकर कोल्हू चलाया जाता है तब ये बीज न केवल पिस जाते हैं बल्कि उनसे तेल तक बाहर निकल आता है। इस कोल्हू का सबसे बड़ा लाभ तो यह है कि सभी मसाले और जड़ीबूटियाँ साबुत ही इसमें डालकर पहले उनका पाउडर तैयार कर सकते हैं और फिर साबुत ही धूप की जड़ें डालकर धूपबत्ती के पिण्ड तैयार कर सकते हैं। इस प्रकार ग्राइण्डर और मिक्सर दोनों का ही कार्य कर देता है यह कोल्हू।

जहाँ तक पूँजीनिवेश का प्रश्न है उद्योग प्रारम्भ करते समय एक लाख रुपए के लगभग सभी मशीनों की खरीद पर लग जाते हैं और दो-तीन लाख रुपए कार्यकारी पूंजी के रूप में भी
चाहिए। परन्तु बाद में उत्पादन बढ़ाते समय तो केवल कोल्हू अथवा एज रनर ही लेना पड़ता है। क्योंकि एक ग्राइण्डर और एक रोलर मिल ही पाँच क्विटल तक धूप के लिए सूखे रचक पीसने और बाइण्डर तैयार करने के लिए पर्याप्त रहता है। जहाँ तक लाभ प्रतिशत का प्रश्न है सस्ती दर पर बिकने वाली धूपों में भी दस-बारह प्रतिशत शुद्ध लाभ है ही, जबकि अच्छी क्वालिटी की धूपों में तो पन्द्रह से पच्चीस प्रतिशत तक शुद्ध लाभ का अर्जन है।

परम्परागत तथा आधुनिक रचक (Raw Materials)

धूपबत्ती का मुख्य आधार रचक धूप नामक पौधे की सूखी हुई जड़े हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के पहाड़ों पर काफी ऊंचाई पर यह झाड़ियों के रूप में उगता है। इस पौधे की पूरी तरह सूखी हुई जड़ों को जब कूटा जाता है तो उनमें से कोलतार जैसा काला, परन्तु तीव्र ज्वलनशील और मन्द सुगन्धयुक्त पेस्ट इतनी मात्रा में निकलता है कि जड़ों की लकड़ी के साथ-साथ कुल भार का तीन चौथाई अन्य लकड़ियों का बुरादा भी इसमें घुल-मिल कर गूथे हुए आटे जैसा पिण्ड बन जाए। पहले तो धूप के पौधों की जड़ों में चन्दन की लकड़ी का बुरादा, कपूर-कचरी, बालछड़, नागर मोथा और खस जैसी सुगन्ध प्रदायक जड़ी-बूटियाँ, लौंग, बड़ी व छोटी इलायची, तेज पत्ते, दालचीनी जैसे कीमती मसाले और गुगुल,लोबान और राल जैसे ज्वलनशील पेड़ों से प्राप्त होने वाले रेजीन डाले जाते थे। परन्तु ये सभी वस्तुएँ बहुत अधिक महंगी हैं, अतः इनसे निर्मित धूप डेढ़ सौ से दो सौ रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर पड़ेगी।
आज धूपबत्ती के निर्माण में उपरोक्त रचकों के स्थान पर डमी अगरबत्तियों के समान ही साधारण लकड़ियों के बुरादे, पिसे हुए कोयले और सूखे पत्तों आदि को बारीक पीसकर प्रयोग
करते हैं। वैसे इनमें सबसे अधिक प्रयोग होता है मूंगफली के छिलकों का। मूंगफली के छिलके, भार में हल्के, शीघ्रता से जलने वाले, कम बाइण्डर में भली प्रकार गूंथने में समर्थ तो होते ही हैं, इनका धुआं  भी सफेद होता है। ज्वलनशीलता बढ़ाने के लिए लोबान अथवा गुगुल के प्रयोग की हम कल्पना भी नहीं कर सकते, राल भी काफी महंगी है अतः प्रायः साफ-सुथरा बिरोजा ही मिलाया जाता है। परंपरागत वस्तुओं में शायद धूप के पौधों की जड़ें ही एकमात्र वह वस्तु है

जिसका कम अथवा अधिक मात्रा में प्रयोग आज भी इस उद्योग में हो रहा है।
धूप की जड़े धूपबत्ती में बाइण्डर का कार्य करती हैं, परन्तु महंगी पड़ने के कारण अच्छी धूप में ही इसे प्रयोग कर पाते हैं। इसके स्थान पर आजकल प्रायः ही रबर को सालवेट में
घोलकर बनाए गए पेस्टों का प्रयोग किया जाता है। यह रबर पेस्ट काफी चिपचिपा होता है। अतः चीपक घटाने और तरल रचकों की मात्रा  बढ़ाने के लिए कोई तेल भी इसमें मिलाया जाता हैं। सस्ती धूपों में प्रायः ही जला हुआ मोबिल ऑयल और इसकी गाद तथा ग्रीस मिलाई जाती है तो बहुत अच्छी धूप में नारियल का तेल। देशी घी और जड़ी बूटियों से निर्मित सौ से डेढ़ सौ रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर बिकने वाली  धूपो मे भी प्रायः देशी घी, कोई जड़ीबूटी और कीमती मसाला नहीं डाला जाता। अन्तर मात्र यह है कि इनमें भरपूर मात्रा में धूप की जड़ का तो प्रयोग करते ही हैं , जले हुए मोबिल ऑयल के स्थान पर नारियल का तेल और साथ ही भरपूर मात्रा में गरममसाले तथा मक्खन की कृत्रिम सुगन्धे भी मिलाते हैं। जहाँ तक लकड़ियों केबुरादों, मूंगफली के छिलकों और अन्य सूखे पदार्थों का प्रश्न है, उनमें अधिक अन्तर नहीं होता।

सूखे रचकों का समन्वय (Powder Mixing)


धूपबत्तियों के कोई निश्चित फार्मूले नहीं होते। लकड़ियों के बुरादे, सूखे पत्तों और कोयले के पाउडर से लेकर सोयाबीन अथवा मूंगफली की खल तक इनमें ठोस रचकों के रूप में मिलाई जाती है। तेल निकालने के बाद भी खल में पर्याप्त चिकनाई होती है, यह आसानी से मन्द गति से जलती है और अधिक महंगी भी नहीं, अतः प्रायः ही अच्छी धूपों में पर्याप्त मात्रा में मिला ही लेते हैं। वैसे इस उद्योग का सबसे प्रमुख कच्चा माल आज मूंगफली के छिलके बन चुके हैं। सूखा मिश्रण प्रायः ही तीन चौथाई मूंगफली के छिलके, दस से पन्द्रह प्रतिशत लकड़ी का बुरादा, पांच से दस प्रतिशत लकड़ी के कोयले और कुल भार के दो से चार प्रतिशत कलमी शोरा मिलाकर तैयार किया जाता है। मूंगफली के छिलकों के स्थान पर सूखे पत्तों का प्रयोग करते समय सूखे पत्तों, लकड़ी के बुरादे और कोयलों को लगभग समान मात्राओं में मिलाकर
प्रयोग करते हैं। कारण स्पष्ट हैसूखे हुए पत्ते बहुत तीव्र गति से जलते हैं, मूंगफली के छिलके तीव्र गति से, लकड़ियों का बुरादा मध्यम गति से और कोयलों का पाउडर अत्यन्त मन्द गति से। इसी प्रकार पत्तों और मूंगफली तथा चनो के छिलकों से बनी धूप काफी फुसफुसी और भार में हल्की होती है, तो लकड़ियों के बुरादे और कोयलों से निर्मित अधिक ठोस एवं भारी। पत्थर के कोयलों का पाउडर और लकड़ी के कोयलों की मिट्टी मिश्रित झड़न बहुत अधिक भारी तो होते ही हैं जलते भी आसानी से नहीं। 'यही कारण है कि जब अधिक मात्रा में छिलकों और पत्तों का प्रयोग करते समय ही थोड़े बहुत पत्थर के कोयलों की मिलावट कर ली जाती है। अच्छी धूप वही है, जिसमें विभिन्न सूखे पदार्थ इस अनुपात में मिलाए गए हों कि न तो धूपबती बहुत ही जल्द जलकर समाप्त हो जाए और न ही बीच में बुझे । 

पाण्डर के घटक (Binding Materials)


धूप के निर्माण में प्रायः ही रबड़ को पीसकर और किसी साल्वेण्ट में घोलकर पेस्ट बनाने के बाद बाइण्डर के रूप में प्रयोग करते हैं। प्राकृतिक क्रेप रबर सफेद रंग की होती है और
स्मोक्ड रबर काले रंग की। इसके अलावा कई प्रकार की कृत्रिम रबरें भी हैं, परन्तु ये सभी प्रयाप्त महंगी हैं। पुराने टायरों और ट्यूबों आदि से निकाली गई रबर रिक्लेम्ड रबर कुछ सस्ती पड़ती हैं परन्तु अधिक कठिनाई से तो पिसती ही है ज्यादा सस्ती भी नहीं। इन सबके विपरीत  रबर की चप्पलों के तले बनाते समय फालतू निकलने वाले रबर के टुकड़े लगभग मुफ्त ही मिल जाते हैं। हवाई अथवा नायलोन की इन चप्पलों के तले बड़ी-बड़ी शीट के रूप में होते हैं, जिन्हें डाई की सहायता से वांछित आकारों में काटा जाता है। शीट का शेष भाग बेकार फेंका जाता है, जिसको बारीक काटकर आप बाइण्डर तैयार करने के लिए आसानी से प्रयोग कर सकते हैं।
रबर को पीसते समय उसमें ऐसा कोई घोलक या साल्वेण्ट भी मिलाया जाता है जिसमें घुलकर वह पेस्ट का रूप ले ले। साल्वेण्ट के रूप में प्रायः ही एसीटोन, इथाइल एसीटेट, ब्यूटाइल एसीटेट, टाल्विन,बेंजीन, नैफ्था, पैट्रोलियम ईथर और बेन्जेल्डीहाइड जैसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है। ये सभी साल्वेण्ट पर्याप्त महंगे और शीघ्र ही आग पकड़ने वाले हैं। अतः इस घोल को पतला करने के लिए थिनर के रूप में तारपीन के तेल, पाइन ऑयल अथवा मिट्टी के तेल के साथ पर्याप्त मात्रा में पानी भी मिलाया जाता है। इसके साथ ही प्रयोग की जाने वाली रेजीनें, बिरोजा और फैक्टाइस के नाम से आने वाली तेलों की गाद तो इस बाण्डर में मिलाई ही जाती है, बिटुमिन नामक विशिष्ट कोलतार का प्रयोग भी इनके निर्माण में आजकल खुलकर हो रहा है।

धूपबत्ती के लिए रबर के बाइण्डरों के कोई निश्चित फार्मूले नहीं हैं। रबर के घोल का प्रयोग चिपकाने के लिए नहीं, मिश्रण को गुंधने के लिए किया जाता है, अतः वही घोल अच्छा रहेगा, जो न तो जल्द सूखे और न ही अधिक चिपचिपा हो। यही कारण है कि पर्याप्त मात्रा में बिरोजा तथा वृक्षों से प्राप्त होने वाली सस्ती रेजीनें तो आप इन बाइण्डरों में मिलाएंगे ही, फैक्टाइस और बिटूमिन् भी पर्याप्त मात्रा में मिला लें। इनकी मात्राएँ हम फार्मूलों में नहीं दे रहे, क्योंकि धूप की  गुणवत्ता और मूल्य के अनुरूप ही इन वस्तुओं की मिलावट की जाती है।

 सस्ता और अच्छा बाइण्डर (Popular Binder)

रबर के साथ दोगुनी मात्रा में रेजीन और तीन गुनी मात्रा में खनिज स्प्रिट अथवा अन्य बिलायक और सवा गुना पानी मिलाने  पर इतना पतला घोल तैयार होता है कि मिश्रण से डेढ़ गुना तक सूखे रचक आसानी से घुटमिल जाएं और पकड़ भी मजबूत बनी रहे। यही कारण है कि पर्याप्त मात्रा में मोबिल ऑयल और फैक्टाइटस तथा अधिक मात्रा में पानी मिलाकर इसमें आप मिश्रण के भार के दो से तीन गुने तक सूखे पदार्थ आसानी से खपा सकते हैं। फैक्ताइट्स, मोबिल ऑयल, अन्य तेल और बिटुमिन आदि आप धूप की क्वालिटी, मौसम और आवश्यकता के अनुरूप कितने भी मिला सकते हैं।

      रबर का चूरा (Rubber Chips)      1 किलो ग्राम
      सख्त रेजीन (Q. I. Resin )             1.75 किलो ग्राम
      खनिज स्प्रिट (Mineral spirit)       3 लिटर
      सनलाइट या निरोल साबुन (Soap)      200 ग्राम
      पानी (Water)                              1.25 लिटर
स्मोक्ड रबर इसमें सर्वश्रेष्ठ रहेगी। वैसे आप हवाई चप्पल की कतरनों का प्रयोग भी कर सकते हैं। रबर को बारीक काटकर और खनिज स्प्रिट में डालकर दो-तीन दिन पहले फूलने के
लिए रख देते हैं। पानी में रेजिन घोलने के बाद रोलर मिल में डालकर रबर रेजिन के घोलों को घोंटते हैं और एक-एक करके अन्य रचक मिला देते हैं। साबुन को थोड़े से पानी में गलाकर सबसे अन्त में मिलाया जाता है। थिनर के रूप में आप आवश्यक मात्रा और सूखने की गति के अनुरूप पानी, अल्कोहल, स्प्रिट या मिनरल ऑयल का प्रयोग कर सकते हैं।
रबर पर आधारित कोई भी बाइण्डर रेजीनों का घोल और धूप की जड़ें पीसने के लिए तीन अथवा अधिक रोलर लगी रोलर मिल तो आपने अनिवार्य रूप से लेनी ही होगी। याद है।
और धूप की जड़ें पीसने लिए तीन अथवा अधिक रोलर लगी मिल तो आपको अनिवार्य रूप से लेनी ही होगी। यदि छह रोलर लगी मिल ले ली जाए, तब सलवेट के खर्च में काफी बचत भी की जा सकती है । तंबाकू की पत्तियाँ काटने वाली टबॉको लीफ चिपिंग मशीन में रबर को बारीक काटने के बाद सलवेट में डालकर फुलाने के स्थान पर सीधे ही मशीन में डालकर चलाने पर रबर मुलायम हो जाती है, तब थोड़ा सा सलवेट और रेजीने डालकर घुटने देते हैं। इसके बाद इस घोल में थिनर, व्हाइट ऑयल और पानी मिलाकर इसी मशीन में उसे पतला करके फाइनल बाइण्डर तैयार कर लिया जाता है।

ट्रिपल रोलर मिल में तो तीन रोलर्स एक दूसरे की बगल में लगे होते है, परंतु पाँच अथवा अधिक रोलरों वाली मशीनों में रोलरों की ऊपर नीचे दो श्रृंखलाएँ होती हैं सभी रोलर एक दूसरे से सटे हुए होते हैं और अलग-अलग गतियों से घूमते हैं। आगे का रोलर मन्द गति से घूमता है और पिछला रोलर तेज गति से। ये बेलन अथवा रोलर धलवा लोहे के और अन्दर से खोखले होते हैं। इनके मध्य भाप अथवा पानी गुजारकर मिश्रण को वांछित तापमान पर नियन्त्रित रखा जा सकता है। प्रायः ही तेज गति से घूमने वाला रोलर गर्म और धीमे
घुमने वाला अगला रोलर अपेक्षाकृत कम गर्म और अन्तिम एकदम ठण्डा रखा जाता है। घोंटते समय मशीन निरन्तर चालू रखी जाती है और सभी वस्तुएँ पिछले रोलर पर ही डालते हैं। बीस हजार से लाखों रूपए तक विभिन्न क्षमता और मापों में आती हैं ये मशीनें, जबकि टबॉको लीफ चिपिंग मशीन तीन से पाँच हजार रुपए के मध्य ही आ जाती है।

रोजीन आधारित बाइण्डर (Rosin Binder)

बहुत ही अच्छी धूपों में इस बाइडर का प्रयोग होता है। इससे बनी धूप लम्बे समय तक मुलायम बनी रहती है और जो भी सुगन्ध मिलाते हैं वह खुलकर असर दिखलाती है। इस फार्मूले का प्रयोग करते समय रबर को साल्वेण्ट में फुलाना नहीं पड़ता। सीधा ही रोलर मिल में डालकर और रोजीन मिलाकर पीस लेते हैं और फिर रेजीन तथा साल्वेण्ट डालकर घोंटने के बाद अन्य सभी रचक मिला लेते हैं-

      रबर का चूरा (Rubber Chips)        500 ग्राम
     कोई रोजीन या सख्त रेजीन (Rosin)   3-4 किलोग्राम
     बिरोजा या मुलायम रेजीन (Resin)      1-2 किलो ग्राम
    विलायक अर्थात साल्वेण्ट (Sovent)      5 लिटर
     थिनर व पानी (Thinner)               आवश्यकतानुसार
इस फार्मूले में आप रबर की मात्रा चार गुने तक बढ़ाकर प्रयोग कर सकते हैं। इस में प्रति सौ ग्राम रबर ढाई सौ मिली लीटर साल्वेण्ट भी आपको अतिरिक्त प्रयोग करना होगा। इस बाइण्डर में फैक्टाइस और नारियल का तेल तथा गर्म मसाले एवं मक्खन की सुगन्ध मिलाकर सर्वोत्तम क्वालिटी की धूपें बनाई जाती हैं। इस तरह की धूप बनाते समय इस बाइण्डर के  साथ धूप की जड़ों का प्रयोग भी अच्छे निर्माताओं द्वारा किया जाता है।

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