ऐसे खड़ा करें खाद्य रंगो के निर्माण का उद्योग का व्यापार (you can stand your food colours business at your home)


रेडीमेड फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम और गोली टॉफी ही नही, फलों के विभिन्न उत्पादों तक में खाद्य रंगों का प्रयोग होता है और अनिवार्य रूप से होता है। इस वर्ग के सभी उद्योगों का सबसे बड़ा और जटिल रहस्य ही वांछित मात्रा में उचित रंग और सुगंध का प्रयोग है। यह सत्य है कि अधिकांश खाद्य पदार्थों में इतनी कम मात्रा में रंगों का प्रयोग होता है कि उपभोक्ता को यह लगता ही नहीं कि वह जिस रेडीमेड फूड का प्रयोग कर रहा है उसमें कोई रंग और सुगंध भी मिली हुई है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जहां हम इन खाद्य पदार्थों में रंग मिलाने के लिए विवश हैं, वहीं बाजार में मिलने वाली सामान्य पानी अथवा तेल में घुलनशील रंगो का खाद्य वस्तुओं में प्रयोग कानून की दृष्टि में एक भीषण अपराध है। हमारे देश में हलवाईयों के चालान दूध में पानी और देसी घी में वनस्पति घी की मिलावट के कारण तो कम परंतु जलेबी, बूंदी के लड्डू, बूंदी और सेब में पीले रंग की मिलावट के कारण अधिक होते हैं। रंगो के प्रयोग के बारे में कानून अत्यंत कठोर हैं। अतः आप किसी भी स्तर पर कोई भी खाद्य अथवा पेय पदार्थ तैयार करें, अपने प्रयोग के लिए स्वयं खाद रंग और सुगंध तैयार करना ही उचित रहता है।

रंगो का महत्व एवं संयोजन importance of colours


अच्छे से अच्छा पूर्ण पौष्टिक, स्वच्छ, शुद्ध और स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ भी खाने में तब तक पूर्ण आनंद नहीं दे पाता, जब तक उसका रंग रूप और आकृति मनभावन ना हो। वस्तु के स्वाद का पता हमें चखने के बाद लगता है और सुगंध का उसे नासिका के पास ले जाने पर परंतु रंग तो हमें दूर से ही दिखाई दे जाता है। जब हम विभिन्न खाद्य पदार्थों को देखते हैं तब उसके रंग रूप के बारे में हमारी आंखें कुछ सूचनाएं मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं। इन सूचनाओं के आधार पर ही हमारा मस्तिष्क एक वस्तु के बारे में कुछ धारणाएं बनाता है। जब हम उस वस्तु को खाते अथवा पीते हैं तब हमारी भावनाएं स्वाद को पूर्णता प्रदान करने में एक अहम भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि अधिकांश खाद्य और पेय पदार्थों में रंग वस्तु के स्वाद और सुगंध का प्रतीक ही बन चुके हैं। नारंगी रंग से हल्का नारंगी रंग संतरे, ब्राउन रंग चॉकलेट, हल्का पीला रंग और लाल रंग गाजर और टमाटर के स्वाद का प्रतीक बन चुका है। रंग और सुगंध का यह संयोजन आप कितना अच्छा कर पाते हैं, इस पर ही निर्भर करती है इस उद्योग में आपकी सफलता।

कृत्रिम खाद्य रंग synthetic food colours

रसायनों से निर्मित, धात्विक अथवा तीक्ष्ण रंगों का प्रयोग खाद्य और पेय वस्तुओं में वर्जित है। इनमें सबसे अच्छा तो विभिन्न फल, फूलों, जड़ी-बूटियों, सब्जियों आदि से स्वयं रंग तैयार करके प्रयोग करना है। वैसे हमारे देश में अनेक निर्माता रंग प्रदायक वृक्षों के उत्पादों और सौम्य रसायनों का प्रयोग करके कृत्रिम खाद्य रंग का निर्माण कर रहे हैं। पर्याप्त महेंगे और कम रंग प्रदायक क्षमता युक्त होते हैं यह खाद्य रंग। यही कारण है कि कुछ बेईमान दुकानदार स्टार्च अथवा अन्य किसी हल्के भर्ती के पदार्थ में थोड़ा सा सामान्य रंग मिलाकर भी इस रूप में बेचते हैं। आप इस प्रकार के रंग खरीदते समय सदैव अच्छे निर्माता के बने हुए सीलबंद रंग किसी विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें। केवल चंद ही हैं इस प्रकार के रंग जो इस प्रकार है।

पीला रंग yellow colour


खाद्य पदार्थों और शीतल पेयों में मात्रा की दृष्टि से सबसे अधिक प्रयोग पीले रंग का होता है। संतरी से लेकर केसरिया तक के सभी शेड पीले रंग में थोड़ा सा लाल रंग मिलाकर तैयार किए जाते हैं। भारतीय मिठाइयों और पुलाओ में पीले रंग का प्रयोग प्राचीन काल से होता रहा है। परंतु यह हमारा अज्ञान ही है कि अधिकांश हलवाई और घरेलू महिलाएं बाजार से गाय छाप अथवा कोई अन्य खाद्य रंग लेकर प्रयोग कर लेते हैं। क्रोमियम अर्थात धात्विक लवणों से बने अथवा तीक्ष्ण रसायनों से निर्मित रंग स्वास्थ्य पर घातक असर डालते हैं और कानून की दृष्टि में इनका प्रयोग वर्जित है। पीले रंग के रूप में आप टारट्रेजिन yellow A.B. या yellow O.B. नामक रंग का ही  प्रयोग कर सकते हैं। इनमें येलो ए बी तथा येलो ओ बी तेल में घुलनशील है तो टारट्रेजिन सामान्य पानी में ही घुल जाता है।

लाल रंग red colour

लाल रंग काफी गहरा होता है और यही कारण है कि चमकीले लाल से गुलाबी तक के सभी सेड बनाने के लिए इसके साथ अल्प मात्रा में पीला रंग भी मिलाया जाता है। वास्तव में पीले, संतरी, नारंगी से लेकर लाल तक के सभी शेडो में पीले और लाल रंग का विविध अनुपात में मिश्रण हीं है। केवल चार लाल रंगों _ एरिथरेसिन्न,पौंसियू 3R और पौंसियू 5x का प्रयोग ही आप खाद्य वस्तुओं और पेय पदार्थों में कर सकते हैं।

हरा रंग  green colour


हरे रंग के विभिन्न शैडो के लिए गीनिय ग्रीन, एफ. सी. एफ. ग्रीन तथा यस. एफ. लाउड ग्रीन रंगों का प्रयोग किया जाता है। यद्यपि पीले रंग में नीला रंग मिलाकर भी हरा रंग तैयार किया जा सकता है, परंतु उसकी चमक और शेड काम चलाऊ ही होता है। जहां तक की नीले रंग का प्रश्न है इसके लिए सोडियम इंडिगो डाई सल्फोनेट नामक परिष्कृत नील का प्रयोग किया जाता है।

कृत्रिम रंगों की प्रयोग विधि how to use synthetic colours

इन रंगों में पर्याप्त रंग प्रदायक क्षमता होती है, परंतु ताप के प्रभाव से यह खराब हो जाते हैं, अथवा अपना शेड बदल देते हैं। यही कारण है कि इन्हें तैयार वस्तु के एकदम ठंडा हो जाने के बाद मिलाने के लिए हम विवस हैं। दानेदार अथवा पाउडर रूप में होते हैं यह कृत्रिम खाद्य रंग। यही कारण है कि इन्हें रंग के भाग के 10 गुने तरल ग्लूकोज़, डिस्टिल्ड वाटर अथवा उबालने के बाद ठंडे किए हुए पानी में घोलकर और शीशियों में भरकर रख लिया जाता है। ठंडे सूखे और नमी रहित स्थान में रखी जाती है यह शीशियां। इस प्रकार घोल बनाने के दो प्रमुख लाभ हैं घुला हुआ होने के कारण रंग संपूर्ण मिश्रण में समान रूप से मिल जाता है और आप आसानी से यह निर्धारित भी कर सकते हैं कि प्रति किलोग्राम अथवा प्रति लीटर खाद्य या पेय पदार्थों में कितने मिली लीटर यह घोल डालना है।


मृदुल खाद रंग caramel colours

रंग प्रदायक जड़ी-बूटियों, फलो, फूलो, पेड़ों की छालों आदि से निर्मित यह रंग सर्वश्रेष्ट होते हैं और पकाने पर भी अपना शेड नहीं बदलते। यह तरल रूप में आते हैं परंतु बहुत अधिक महंगा पड़ता है इनका प्रयोग। स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित और स्वाद में काफी मधुर होते हैं यह रंग। क्योंकि तरल ग्लूकोज में विशिष्ट अलकालीज और खाद्य वस्तुएं पकाकर तैयार किए जाते जाते हैं यह तरल खाद रंग। बाजार में बेकर्स और कारमेल कलर्स के नाम से बिकते हैं यह रंग। इस प्रकार के बने बनाए रंग खरीदते समय किसी विश्वसनीय संस्थान के बने हुए सीलबंद रंग ही खरीदें। दुकानदार की जरा सी बेईमानी आपके लिए परेशानी का कारण भी बन सकती है। वैसे भी बहुत ही कम रंग प्रदायक क्षमता होती है इन बने बनाए तरल रंगों में, परंतु मुख्य मात्रा तो ग्लूकोज की ही होती है। यही कारण है कि खाद्य पदार्थों में साधारण शेड परिवर्तन के लिए भी इन्हें मिश्रण के भार का एक से 5% तक मिलाना पड़ता है। यही कारण है कि आप किसी भी स्तर पर खाद्य अथवा पेय पदार्थों का निर्माण करें, सबसे अच्छा रहेगा अपने प्रयोग के लिए स्वयं रंग तैयार करना।

खाद्य रंगो का निर्माण synthetic colours manufacturing

कृत्रिम खाद रंगों का प्रयोग मुख्य रूप से कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, शरबतों आदि में होता है परंतु बिस्कुट और वेफर्स आदि में इसका प्रयोग संभव नहीं। जहां तक तरल रूप में आने वाले मृदुल खाद्य रंगों का प्रश्न है, इनकी दर काफी अधिक हो तो है ही बाजार से लेने पर मिलावट की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फलो, फूलो, मसालों और जड़ी बूटियों द्वारा निर्मित होने के कारण यह सभी रंग स्वास्थ्य के प्रति सुरक्षित तो होते ही हैं, आधार रक्षक की थोड़ी सुगंध और स्वाद भी इनमें होता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि स्वयं तैयार करने पर अधिक महंगे भी नहीं पढ़ते यह रंग, और न ही इन्हें तैयार करना ही कुछ जटिल है।

टेसू के फूलों व हल्दी से पीला रंग yellow colour

पलाश वृक्ष के सूखे फूलों को टेसू के फूल कहा जाता है और पंसारियों के यहां काफी सस्ती दर पर मिल जाते हैं। पहले तो होली खेलने के लिए भी इन से बने पीले रंग का प्रयोग किया जाता था। पर्याप्त पानी में टेसू के यह सूखे फूल डालकर एक-दो दिन रखा रहने देते हैं। बाद में पानी को छानकर प्रयोग करते रहते हैं और फूलों की लुगदी फेंक दी जाती है। ताप लवणों और सामान्य रसायनों का इस रंग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यहां तक कि इस रंगीन पानी को आप चाशनी पकाने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं। हल्दी द्वारा निर्मित पीले रंग में तो हल्दी का भरपूर स्वाद और सुगंध भी होती है। इसके लिए 1 किलो ग्राम हल्दी की गांठ को दरदरा कूटकर कांच के जार में डालने के बाद उसमें 2 लीटर निरगंध अल्कोहल और 2 लीटर पानी डालकर आठ-दस दिन रखा रहने देते हैं। इसे प्रतिदिन दो-तीन बार हिलाते चलाते रहते हैं और बाद में अल्कोहल मिश्रित पानी को छानकर रंग के घोल के रूप में रख लेते हैं।


फलसो और करोंदो से लाल रंग herbal red colours

करौंदे वर्षा ऋतु में सस्ती दर पर मिलने वाली विशिष्ट सब्जी है तो फालसे गर्मियों में मिलने वाला एक छोटा और महंगा फल। इन दोनों से बने रंगों से भरपूर स्वाद और मधुर सुगंध भी होती है परंतु मौसम में ही उपलब्ध हो पाना और प्रयाप्त महंगा पडना इनकी दो बड़ी कमियां हैं। फाल्से और करौंदे बहुत जल्दी खराब हो जाने वाले ऐसे फल हैं जिनका संपूर्ण गुदा ही रंगीन होता है। यही कारण है कि चीनी और पानी मिलाकर चाशनी की तरह पकाकर इनका रंगीन सरबत तैयार कर लिया जाता है। और फिर इसका प्रयोग रंग के रूप में करते रहते हैं। हरे करौदे तो बहुत ही खट्टे और रंग प्रदायक क्षमता बिहीन होते हैं, परंतु पक जाने पर इनका गुदा गहरा लाल हो जाता है। फालसो की तरह ही आप इन पके करोदो का भी लाल सर्बत बनाकर रंग के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। मुख्य ध्यान रखने की बात यह है कि फलों से तो हल्की बैगनी आभा युक्त लाल रंग तैयार होता है परंतु पके हुए करोदो से खूनी लाल रंग तैयार होता है। वैसे अच्छे शरबतों,स्कवेशों,जैम जैली और आइसक्रीम में ही इन दोनों रंगों का प्रयोग प्राय: किया जाता है।

रतन ज्योति और कोच्चि नील से लाल रंग

रतनजोत एक पेड़ की छाल है। एक लीटर तेल में 10 -15 ग्राम यह सूखी छाल डालकर रख देने पर ही हफ्ते भर में तेल गहरा लाल हो जाता है। पर्याप्त पानी अथवा तेल में हफ्ते 10 दिन तक रतन ज्योति नामक छाल डाल देने पर वह धीरे धीरे अपना संपूर्ण रंग इस तेल या पानी में छोड़ देती है। इस रंगीन पानी का प्रयोग भी आप चाशनी पकाने तक के लिए कर सकते हैं। कच्ची इमली का प्रयोग भी लाल रंग बनाने के लिए किया जा सकता है परंतु काफी खट्टा होता है गहरे लाल रंग का यह पानी। कोच्चि नील, क्रीम दाना और करम दाना एक ही वस्तु के 3 नाम है। काफी तीक्ष्ण होती है इनकी रंग प्रदायक क्षमता और पडता भी बहुत सस्ता है। इसे तैयार करने का फार्मूला व विधि इस प्रकार है----
          कोच्चि नील               450 ग्राम
         पोटेशियम बाइकार्बोनेट         150 ग्राम
         गंधहीन अल्कोहल               1 लीटर
           पिसी हुई चीनी                  5 किलो

वैद्यों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले खरल में कोचीनील और इसका एक तिहाई पोटैशियम बाइकार्बोनेट मिलाकर अच्छी तरह खरल करते हैं, जिससे दोनों रचक परस्पर मिलकर एक जान हो जाएं। खरल में रगड़ते समय चंद बूंदे अल्कोहल की आप ईसमें मिला सकते हैं, परंतु इसे सूखा ही रगड़े, पेस्ट न बनाएं। एक बड़ी बोतल या जार में यह पाउडर डालकर उसमें अल्कोहल और 300 मिलीलीटर साफ व ताजा पानी डालकर अच्छी तरह हिलाइए और बोतल को एक और रख दीजिये। दूसरे दिन एक कड़ाही में चीनी और पर्याप्त पानी डालकर चासनी बनाईए और जब चीनी पानी में घुल जाए तब बोतल का तरल मिश्रण चासनी में डाल कर अच्छी तरह पकाइए।अल्कोहल तो उड़ जाएगा और तैयार हो जाएगा गहरे लाल रंग का शरबत। इसे छानकर फोक तो फेंक देते हैं और आवश्यकता के समय इस शरबत को खाद्य लाल रंग के रूप में प्रयोग करते रहते हैं।

नीला खाद्य रंग blue colour

नीले रंग का प्रयोग मूल रूप से तो बहुत कम परंतु विविध शैडो के हरे रंग और चॉकलेट ब्राउन कलर बनाने के लिए अन्य रंगों के साथ प्राय: ही किया जाता है। तकनीकी भाषा में इसे सोडियम इंडिगो डाई सल्फोनेट कहा जाता है। शुद्ध नील पर गंधक के तेजाब की रासायनिक प्रक्रिया द्वारा यह रंग तैयार किया जाता है। इसे तैयार करने के लिए आप धातु के नहीं बल्कि मिट्टी अथवा चीनी मिट्टी के बर्तनों का ही प्रयोग करें, क्योंकि सभी धातुओं को तो गंधक का तेजाब काट ही देता है। एक बूंद शरीर पर गिरते ही जलाकर गहरा घाव भी कर देता है।

स्वयं नीला रंग तैयार करने के लिए एक किलोग्राम उत्तम क्वालिटी की कपड़ों पर लगाए जाने वाली शुद्ध नील को सूखा ही एक मिट्टी की बड़ी परात में फैला लीजिए। चार लीटर गंधक का तेजाब( सल्फ्यूरिक एसिड) लेकर चीनी मिट्टी के किसी कप से थोड़ा थोड़ा करके इसे नील पर बिखेरते जाएंगे। तेजाब नील में घुलता चला जाएगा। गंधक का तेजाब शरीर को जला देता है और धातुओं को काट देता है। अतः नील को उलटने पलटने के लिए कांच की छड़ का प्रयोग करें। सारा तेजाब मिलाने के बाद बर्तन को अच्छी तरह ढक कर रख दीजिए जिससे गैस बाहर ना निकले। रासायनिक क्रिया प्रतिक्रिया द्वारा 24 घंटे में नील और गंधक के तेजाब का यह घोल सल्फो इंडिगो एसिड के रूप में परिवर्तित हो जाएगा।
दूसरे दिन एक घड़े में यह मिश्रण और 10 ---12 लीटर ताजा पानी डालकर अच्छी तरह हिलाने चलाने के बाद कुछ घंटों के लिए रख दीजिये। नील में मिले आघुलनशील ठोस पदार्थ तथा पानी के लगभग 2 गुना भारी होने के कारण गंधक का तेजाब तल में एकत्रित हो जाएगा।गहरे नीले रंग का पानी ऊपर रहेगा। इसे साइफन द्वारा दूसरे पात्र में निकाल लीजिए। अत्यंत गहरी नीले रंग का होता है यह निथरा हुआ पानी। परंतु इसमें गंधक का तेजाब का अंश भी अनिवार्य रूप से होता ही है। गंधक का तेजाब स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानि प्रद होता है। अतः इस घोल में मिले तेजाब को निष्क्रिय करना आवश्यक है। इसके लिए इस घोल में पोटेशियम कार्बोनेट डालते हैं। यह सल्फ्यूरिक एसिड के साथ मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनाने लगता है और यह गैस पानी के बुलबुलों के रूप में बाहर निकलने लगती है। साथ ही यह घोल कुछ गर्म भी हो जाता है। जब गैस निकलना बंद हो जाए तभी इसे शीशियों में भरकर रख लेते हैं।

चॉकलेट ब्राउन कलर brown colour

चॉकलेट से बने खाद्य पदार्थों में शुद्ध चॉकलेट तो बहुत कम, प्राय: ही कोको पाउडर का प्रयोग किया जाता है, और वह भी अत्यंत अल्प मात्रा में। यद्यपि लाल, पीले और नीले रंगों को मिलाकर भी ब्राउन रंग तैयार किया जा सकता है, परंतु दक्ष निर्माता चीनी अथवा ग्लूकोज को जलाकर ही ब्राउन रंग के रूप में प्रयोग करते हैं। चीनी की चाशनी को यदि आवश्यकता से अधिक समय तक पकाया जाए तब वह पहले तो लालिमा युक्त हो जाती है और उसके बाद लालिमा युक्त काली हो जाती है। काफी कसैला होता है इसका स्वाद। सामान्य भाषा में इसे जली हुई चाशनी या चरब चासनी कहा जाता है, तो इसका तकनीकी नाम है ब्राउन सिरप अर्थात ब्राउन रंग का शरबत।

ब्राउन सिरप का स्वाद कसैला होता है। यही कारण है कि सस्ती गोली टाफियों में तो इसका प्रयोग कर लिया जाता है, परंतु हाई क्लास उत्पादों में ग्लूकोज को जलाकर तैयार की गई ब्राउन शुगर का प्रयोग किया जाता है। इस कार्य के लिए तरल ग्लूकोज अथवा ग्लूकोज पाउडर में उसके भार के बराबर पानी मिलाकर स्टैनले स्टील के बर्तन में रख लेते हैं। थोड़ा खाने वाला सोडा (सोडियम बाइकार्बोनेट) में मिलाकर इसे खारी बना लिया जाता है। इस घोल को भारी तल की कड़ाही में तेज आग पर निरंतर चलाते हुए पकाकर बुरा बना लिया जाता है। गहरे ब्राउन रंग का यह बुरा या पाउडर ठंडे पानी में भी आसानी से घुल जाता है। परंतु यह घुला हुआ पाउडर यदि एक बार सूख जाए तो दोबारा गर्म पानी में भी नहीं घुलता और व्यर्थ ही फेंकना पड़ता है।

शैडो का समन्वय Colour compounding

जहां तक विभिन्न रंग और उनकी विभिन्न शेडें तैयार करने का प्रश्न है, काफी आसान है यह कार्य। मूल रंग तो 3 ही है-  लाल, पीला और नीला। पीले और लाल रंग के मिश्रण से गहरे पीले, नारंगी और चमकदार लाल रंग के सभी शेड बनते हैं तो पीले रंग में 5 से 25% तक नीला रंग मिलाकर हरे रंग के विभिन्न शेड तैयार किए जाते हैं। लाल में नाम मात्र का नीला रंग मिलाने पर फालसाई शेड तैयार हो जाता है तो 20 से 25% नीला रंग मिलाने पर गहरा बैंगनीलाल में रंग। चॉकलेट ब्राउन लाल, पीले और नीले का मिश्रण है, तो कम मात्रा में नीला रंग मिलाने पर ताम्र वरणीय अर्थात कापर ब्राउन रंग तैयार होता है। कम मात्रा में पीले के साथ अधिक मात्रा में लाल व नीला रंग मिलाकर कोला ब्राउन कलर तैयार किया जाता है।


कन्फेक्शनरी आइटम्स, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम और शरबत आदि का तो मुख्य आधार यर रंग ही हैं। अधिकांश खाद्य पदार्थों में भी कम या अधिक मात्रा में इनका प्रयोग होता है। यह सत्य है कि जिन खाद्य पदार्थों में भरपूर मात्रा में अंडों का प्रयोग होता है उनका रंग भट्टी पर सेंकते समय स्वयं ही सुनहरी आभा से युक्त अर्थात गोल्डन येलो हो जाता है। इसी प्रकार चीनी के साथ यदि पर्याप्त मात्रा में ग्लूकोस भी मिला लिया जाए तब भी वह खाद्य पदार्थ पकते समय बिस्कुती पीले कलर का हो जाता है। परंतु काफी महंगा पड़ता है इनका प्रयोग और यही कारण है कि आज लगभग सभी खाद्य पदार्थों में दक्ष निर्माता कम अथवा अधिक मात्रा में रंगो एवं कृत्रिम सुगंधों का प्रयोग करते ही हैं। जहां तक सुगंधों के स्वयं निर्माण का प्रश्न है उनकी संपूर्ण जानकारियां और फार्मूले हमने पिछले पोस्ट
 फलों और फूलों का एसेंस ( Flavours And Essences) कैसे बनाएं? में दे दिया है। जो आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

किसी भी स्तर पर खाद्य अथवा पेय पदार्थों का निर्माण करते समय जहां अपने प्रयोग के लिए स्वयं रंग तैयार करना हर दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ रहता है वहीं पूंजी विहीन व्यक्तियों के लिए इन्हें तैयार करना एक बहुत ही शानदार गृह उद्योग भी है। आप स्वयं के प्रयोग के लिए खाद रंग तैयार करें अथवा बाजार में बेचने के लिए, धात्विक लवणों तथा तीक्ष्ण रसायनों से बने रंगों का प्रयोग भूलकर भी ना करें। डाई, पिपरमेंट और रंग नामक ये रासायनिक रंग स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद ही नहीं जहरीले तक होते हैं। हम बारंबार यह बात इसलिए दोहरा रहे हैं कि चंद रुपयों का यह कच्चा लालच अथवा अज्ञानवश की गई यह छोटी सी भूल, ना केवल उद्योग को बंद करवा सकती है बल्कि उद्योग संचालक को कारावास की सजा भी हो सकती है।

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Bajrangilal

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