ऐसे शुरू करें फल वा मिठाइयों की पैकिंग का बिजनेस



संरक्षित सब्जियों के उत्पादन की अपेक्षा फलों को संरक्षित करने अर्थात फलों की डिब्बा बंदी के लिए काफी अधिक कार्यकारी पूंजी चाहिए। प्राय: ही आम, अनानास, लीची, फालसे, खुमानी जैसे नाजुक मिजाज फल ही सुरक्षित किए जाते हैं। जो पर्याप्त महंगे होते हैं। यही नहीं फलों को पूरी तरह सुखाकर अथवा नमक के घोल में भी संरक्षित नहीं किया जा सकता। पूरी तरह सूख जाने पर यह अपना स्वाद और सुगंध दोनों खो देते हैं। इस प्रकार अंगूर तो किशमिश बन जाते हैं और अन्य सभी फल बेकार हो जाते हैं। नमक मिश्रित पानी में अधिकांश फल गलकर बर्बाद हो जाते हैं तो एसिड मिश्रित चाशनी में पैक करने पर उन्हें खाते समय इतना धोना पड़ता है कि इस प्रकार से संरक्षित फल कोई लेना ही पसंद नहीं करता। यही कारण है कि फलों को चीनी की पर्याप्त  गाढ़ी चासनी, पानी मिश्रित  गिल्सरिन के घोल अथवा एसिटिक एसिड में ही संरक्षित किया जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन घोलों में डालकर फलों को ड्राम में भी नहीं रखा जा सकता। उन्हें तत्काल ही डिब्बों में भर कर और पक्की एयरटाइट सील लगाकर रखने के लिए आप विवश हैं ।यही कारण है कि 1 वर्ष के उत्पादन में जितनी कार्यकारी पूंजी तो इस उद्योग में चाहिए ही।

फलों का चयन व सफाई selection of fruits


फल चीनी की चाशनी, गिलशिरीन के घोल अथवा स्प्रिट मिश्रित चाशनी में संरक्षित किए जाते हैं और पैक करते समय इनके डिब्बे को आधे घंटे के लगभग उबाला भी जाता है। यही कारण है कि पूरी तरह पके हुए नहीं बल्कि कुछ कच्चे अथवा अधूरे रूप से पके और कठोर फलों का प्रयोग करने के लिए ही हम विवश है। फलों को जिस रूप में खाया जाता है, उसी रूप में संरक्षित किया जाता है। अनानास और अमरुद जैसे फल छीलने के बाद फांकों के रूप में डिब्बों में भरे जाते हैं तो फालसे, चेरी, अंगूर आदि ज्यों के त्यों। लीची और आडू आदि छीलकर प्राय: साबुत ही पैक किए जाते हैं। वैसे यह सिद्धांतों से अधिक व्यावहारिक सुविधा और अनुभव की बात है। एक डिब्बे में एक ही किस्म के फल तो भरे ही जाते हैं, चेष्टा यह भी करनी चाहिए कि वह एक ही नस्ल के और समान रूप से पके हुए हों।


फलों को सबसे पहले बहते हुए पानी में अच्छी तरह धोकर सड़े गले अधिक पके हुए और कच्चे फलों को निकालकर अलग कर दिया जाता है। इन छटे हुए फलों को पर्याप्त समय तक पोटेशियम परमैग्नेट के घोल में डाल कर रखा जाता है। जिससे उन पर चिपके अदृश्य जीवाणु समाप्त हो जाए। दोबारा पर्याप्त पानी में धोने के बाद साफ टोकरी में भरकर एकदम स्वच्छ स्थान पर आगामी प्रक्रिया की जाती है। फलों को छीलने और काटने के लिए स्टीनलेस स्टील अथवा चांदी के फाल ब्लड लगे चाकुओं का प्रयोग किया जाता है। लोहे के चाकू प्रयोग करने पर फलों का रंग बदल जाता है। अनानास तो सामान्य रूप से ही छीले जाते हैं परंतु अन्य फलों को इस रुप में छीलने में अधिक समय तो लगता ही है छिलका भी मोटा उतरता है। यही कारण है कि फलों को पतले सूती कपड़े में ढीली पोटली बांधकर अथवा लोहे के तारों की ढक्कन युक्त टोकरी में रखकर पहले तो 2 मिनट तक उबलते हुए पानी में रखते हैं। फिर तत्काल ही इसे बर्फ मिश्रित एकदम ठंडे पानी में डाल देते हैं। इस प्रक्रिया में फलों का छिलका स्वयं गूदे को छोड़ देता है और वह आसानी से छील जाते हैं।

संरक्षण हेतु विविध  घोल preserving compounds

यूरोप और अमेरिका में तो अधिकांश फल और सब्जियां एसिटिक एसिड में साबुत ही डिब्बे में पैक किए जाते हैं, परंतु हमारे देश में इसका प्रयोग प्राय: नहीं होता। एसिटिक एसिड में सुरक्षित फल और सब्जियों को प्रयोग से पूर्व अच्छी तरह धोना ही पड़ता है। हमारे देश की गर्म जलवायु के लिए वैसे भी यह विधि अधिक उपयोगी नहीं है। हमारे देश में इस कार्य के लिए सबसे अधिक प्रयोग पिसी हुई चीनी की बनी सामान्य चासनी का होता है। वैसे आप निम्न तीन में से किसी भी एक घोल का प्रयोग फलों के पैकिंग में कर सकते हैं।

सामान्य चासनी का प्रयोग simple syrup


चीनी पीसने के बाद चीनी के भार के बराबर पानी मिलाकर कच्चे तार की चासनी बनाई जाती है। पीसी हुई चीनी की चाशनी बनाने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि डिब्बे में भरे हुए शरबत में चासनी दानों के रूप में जमती कम है। इस जमाव को पूरी तरह रोकने के लिए मीठे फलों हेतु चाशनी तैयार करते समय उसमें थोड़ा सा साइट्रिक एसिड , पिसी हुई टाटरी अथवा नींबू का रस मिला देते हैं । खट्टे फलों के साथ भरी जाने वाली चाशनी में यह वस्तुएं मिलाना भी अनिवार्य नहीं क्योंकि फलों की खटास ही चीनी को जमने नहीं देती। यह चासनी भरी जाए अथवा आगामी दोनों में से कोई एक मिश्रण डिब्बों में फल भरने के बाद फलों की सतह से 1 सेंटीमीटर ऊपर तक उसे भरा जाता है।

ग्लिसरीन में संरक्षण use of glycerine compound

यूरोप और अमेरिका में गीलसरीन हमारे देश की अपेक्षा बहुत सस्ती है, और चीनी काफी महंगी। इस कार्य के लिए प्राय: ग्लिसरीन का ही प्रयोग किया जाता है। एक लीटर ग्लिसरीन में 5 लीटर डिस्टिल्ड वाटर मिलाकर डिब्बों में भरने के लिए प्रयोग किया जाता है। यहां विशेष ध्यान रखने वाली 2 बातें हैं। ग्लिसरीन पानी से लगभग 2 गुना भारी होती है। अतः ग्लिसरीन और पानी दोनों ही माफ कर प्रयोग करें। एक किलोग्राम ग्लिसरीन तो लगभग आधा लिटर ही बैठेगी। ग्लिसरीन को पानी में डालकर पकाया नहीं जाता, मात्र अच्छी तरह घोट कर तैयार कर लिया जाता है। यही कारण है कि आप सदैव डिस्टिल्ड वाटर का ही प्रयोग करें। सामान्य नल का पानी भी फलों को दूषित कर सकता है, जबकि खारा, भारी व लवण मिश्रित कुओं और हैंडपंप का पानी तो इस कार्य के लिए पूर्णत:, व्यर्थ ही है।

चासनी के साथ अल्कोहल का प्रयोग use of alcohol

ग्लिसरीन में फलों का स्वाद लगभग मूल स्वरूप में बना रहता है, परंतु काफी महंगा पड़ता है इसका प्रयोग। चीनी के बराबर पानी मिलाकर बनाई गई पतली चासनी का प्रयोग करने के बावजूद इस में फल अधिक मीठे तो हो ही जाते हैं। जो हमारे देश में तो चल जाते हैं परंतु विदेशों में नहीं चल पाते। इस समस्या का सबसे आसान समाधान है बहुत पतली चासनी बनाकर उसमें रंग एवं गंध हीन स्प्रिट मिला कर फलों के डिब्बों में भरना। इसके लिए 5 लीटर पानी में 1 किलोग्राम चीनी मिलाकर चाशनी तैयार की जाती है और ठंडा हो जाने के बाद इस चाशनी में 600 से 700 मिलीलीटर निरगंध अल्कोहल अथवा स्प्रिट मिलाकर डिब्बों में भरते हैं। स्प्रिट का प्रयोग करते समय दो बातों का विशेष ध्यान रखें। सामान्य स्प्रिट तो जहर की सीमा तक मादक और स्वास्थ्य के लिए हानि प्रद होती है। अतः गंधहीन और पानी की तरह रंगहीन खाने के लिए प्रयोग की जा सकने वाली स्प्रिट का ही प्रयोग करें। दूसरी मुख्य बात यह है कि एकदम ठंडी चासनी में स्प्रिट अथवा अल्कोहल मिलाते हैं, और डिब्बों में यह चासनी भरने के बाद उन्हें खौलते पानी में नहीं रखते वरना स्प्रिट अथवा अल्कोहल उड़ जाएगा। इन डिब्बों में स्प्रिट मिश्रित चाशनी में रखे फलों का स्वाद तो वास्तविक बना रहता है परंतु अधिक गर्म वातावरण में रखे रहने पर डिब्बों में ही खराब हो सकते हैं। यही कारण है कि देश में बेचे जाने वाले और एशिया, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अरब राष्ट्रों में सप्लाई किए जाने वाले फल या तो सामान्य चाशनी के साथ डिब्बाबंद किए जाते हैं या फिर ग्लिसरीन के घोल में। परंतु यूरोप के ठंडे देशों और कनाडा आदि में सप्लाई करने के लिए प्राय: अल्कोहल या स्प्रिट मिश्रित पतली चासनी का ही प्रयोग किया जाता है।

पैकिंग की चरणबद्ध प्रक्रिया packing process

फलों के समान ही चाशनी में डूबे रहने वाले रसगुल्ले, गुलाब जामुन,पेठे आदि की पैकिंग की जाती है। यह निर्दोष और पूर्ण सावधानी से किया गया पैकिंग ही इन्हें सड़ने से बचाता है। फल अथवा सब्जियां हो या फिर मिठाइयां इन्हें सदैव टीन के बिना छापे डिब्बे में पैक किया जाता है, और ढक्कन के स्थान पर भी दोनों ही ओ र तला ही जड़ा जाता है। कारण यह है कि कोई वस्तु भरने से पहले तो सभी डिब्बों और उन पर ढक्कन के रूप में जड़े जाने वाले तले की आकृति के टीन के टुकड़े को लगभग आधे घंटे तक उबाला जाता है। बाद में भी पर्याप्त समय तक खौलते हुए पानी में रखते हैं।


फलो की कटाई छटाई के साथ ही चाशनी तैयार होने के लिए रख दी जाती है। प्रत्येक डिब्बे में फल, सब्जी अथवा मिठाई इस प्रकार डालते हैं कि ऊपरी किनारे की ओर डेढ़ से दो सेंटीमीटर स्थान खाली रहे। फलों के टुकड़े एक पर एक तह बनाकर नहीं रखे जाते बल्कि तिरछे रुख इस प्रकार डालते हैं कि वह चिपके नहीं। फलों को ना तो दवाना ही चाहिए और ना ही ठूस कर भरना चाहिए ,बल्कि तिरछे रुक इस प्रकार डालना चाहिए कि उन पर ना तो कोई दबाव ही पड़े और ना ही बीच-बीच में बहुत अधिक स्थान रिक्त रहे। अब डिब्बों में गर्म गर्म लगभग उबलती हुई चाशनी इस प्रकार भर दी जाती है कि फल अथवा फलों के टुकड़े पूरी तरह डूब जाएं और उनके ऊपर भी थोड़ी चासनी तैरती रहे। चासनी इतनी अवश्य हो कि फलों की सतह के ऊपर एक सेंटीमीटर तक चढ़ जाए, परंतु लगभग सात आठ सेंटीमीटर  डिब्बा खाली रहना भी आवश्यक है। सामान्य चासनी तो उबलती हुई भरी जाती है ,परंतु स्प्रिट अथवा अल्कोहल मिश्रित चाशनी एकदम ठंडी भरी जाती है, जबकि ग्लिसरीन और पानी के मिश्रण को तो गर्म किया ही नहीं जाता।
अल्कोहल मिश्रित चासनी भरने पर तो डिब्बों पर उसी समय ढक्कन जड़कर एयर टाइट बंद कर दिया जाता है, परंतु सामान्य चासनी अथवा ग्लिसरीन के घोल का प्रयोग करने पर मुंह बंद करने के पहले उन्हें इतना गर्म कर दिया जाता है कि डिब्बों में भरा मिश्रण उबलने लगे। इसके लिए डिब्बों में या जैम की शीशियों को मिश्रण भरते ही उबलते हुए पानी के टब में रखा जाता है। जिस टब या पतीले के अंदर डिब्बे या बोतलें रखी जाती हैं, उसकी निचली सतह पर एक लकड़ी के फ्रेम को इस प्रकार सेट कर दिया जाता है कि डिब्बे गिरे नहीं । बोतलों और डिब्बों के मुंह पानी उसे इतना ऊंचा रखा जाता है कि उबलता हुआ पानी इन में ना जा सके। बोतलों पर कार्क ढीले से चढ़ा देते हैं और डिब्बों को बंद करने का सामान बिल्कुल तैयार रखते हैं। जब डिब्बों में भरा मिश्रण उबलने लगता है उसी समय बोतलों को निकालकर ढक्कन जोर से कस दिया जाता है और डिब्बों की सील बंदकर दिया जाता है। डिब्बा और बोतलों को उबलते हुए पानी में इसलिए रखा जाता है कि उनके अंदर की हवा तो निकल ही जाए जो थोड़ा-बहुत जीवाणु है वह भी मर जाय ।


डिब्बों और शीशियों को सील बंद करने के पश्चात 10 मिनट से आधा घंटा तक पुनः उबलते हुए पानी में रखा जाता है। उबलते हुए पानी से निकाल कर टीन के डिब्बों को तत्काल ही बर्फ अथवा अमोनिया गैस से एकदम ठंडे किए गए पानी में डाल देते हैं। कांच की शीशी ठंडे पानी में नहीं डाली जाती क्योंकि तापमान के इस भीषण परिवर्तन से यह चटक के टूट सकती है। पूरी तरह सुखाने के बाद इन शीशियों और डिब्बों  को प्राय: ही कोल्ड स्टोर में रख दिया जाता है, इन पर लेबल आदि बाजार भेजते समय ही लगाते हैं।
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Bajrangilal

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