वेदांत दर्शन एक सिद्धांत है जो विश्व के सभी धर्मों में पाया जाता है यह दावा करता है कि मनुष्य वस्तुतः दिव्य है तथा जो कुछ भी हम लोग अपने चारों ओर देखते हैं वह उसी दिव्यता के बाद से अद्भुत है यह कविता यदि मनुष्य में अव्यक्त रहती हैं होने तक मनुष्य मनुष्य में भेद नहीं करते सभी समान रूप से देखते हैं यह ऐसा ही है जैसे पीछे एक अनंत समुद्र है और अनंत समुद्र में हम और तुम लोग इतनी सारी लहरें हैं और हम में से हर एक उस अनंत को बाहर व्यक्त करने के निमित्त प्रथम सीन है अतः हम में से हर एक को वह सत्य चित्र कथा आनंद रूपी अनंत समुद्र अव्यक्त रूप से जन्म सिद्ध अधिकार में स्वरूप प्राप्त हैदिव्यता की अभिव्यक्ति की न्यून अधिक शक्ति से ही हम लोगों में विभिन्नता उत्पन्न होती है वेदांत का कहना है कि उसी के आधार पर उससे व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे वह प्रकट करता बल्कि उसके अनुसार व्यवहार करना चाहिए जिसका प्रतिनिधि है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य व्यक्त का प्रतीक है इसलिए हम एक धर्म शिक्षकों को मनुष्य की भर्त्सना करके नहीं , बल्कि मनुष्य में अंतर्निहित दिव्यता के जागरण के लिए सहायता करनी चाहिए वेदांत यह भी बतलाता है कि समाज या कर्म के किसी क्षेत्र में शक्ति की जो विशाल राशि प्रदर्शित होती है वह बस्ता भीतर से बाहर आकर है इसलिए जिसे अन्य संप्रदाय वेदां प्रेरणा कहते हैं उसे वेदांत मनुष्य का बहिष्कार करने की स्वतंत्रता लेता है फिर भी वह किसी संप्रदाय से झगड़ा नहीं वेदांत का लोगों से कोई झगड़ा नहीं है जो मनुष्य की इस दिव्यता को नहीं समझते जातिया अज्ञात रूप से हर मनुष्य इस दिव्यता को व्यक्त करने का प्रयत्न कर रहा है वेदांत का यह दावा है कि यह विचार भारत के अंदर या बाहर सभी धर्मों में पाया जाता है केवल कतिपय धर्मों में यह विचार पुराणों में तथा अन्य में प्रशिक बाद के रूप में प्रकट किया गया है वेदांत का दावा है कि धार्मिक अंतरण केवल एक ही नहीं हुआ है और ना केवल दिव्य मानव की एक अभिव्यक्ति हुई भले ही वह कितना महान क्यों ना हो अपितु उसके कर चुका मानव स्वभाव में प्रकाशन हुआऔर तथा हम लोग जिसे नैतिकता सदाचार और परोपकार कहते हैं वह भी इसी एकत्र की अभिव्यक्ति मात्र है एक वह भी छोड़ आता है जब हर मनुष्य अनुभव करता है कि वह विश्व के साथ एक है और इसको समझने या ना समझे उसको प्रकट करने में विफल हो जाता है जिसे हम प्रेम या सहानुभूति कहते हैं एक तू की एक अभिव्यक्ति है और यही हमारी नैतिकता तथा सदाचार का आधार है यही वेदांत के विख्यात सूत्र तो मशीन तू वही है मैं संक्षेप में कहा गया है हर मनुष्य को यह शिक्षा दी जाती है कि तुम विश्वात्मा से एक हो आता हर जीव आत्मा तुम्हारी ही आत्मा है हर शरीर तुम्हारा ही शरीर है इसलिए दूसरे को चोट पहुंचाना अपने को चोट पहुंचाना है और दूसरे से प्रेम करना अपने आप से प्रेम करना है जैसे बाहर फेंके जाने वाली घोड़ा की लहर बाहर जिस किसी को चोट पहुंचाए तुमको भी चोट पहुंचती ही है और यदि तुम से प्रेम का उद्भव होता है तो वह प्रेम तुम्हारे पास लौटने को बाध्य है यह इस कारण की मैं यह जगत हूं और यह जगत मेरा शरीर है मैं अनंत हूं केवल इसका ज्ञान इस समय मुझको नहीं है परंतु इस अनंत की चेतना प्राप्त करने के लिए मैं संघर्षशील हूं पूर्णता इस अनंत चेतना की पूरी चेतना प्राप्त हो जाने पर ही उपलब्ध होगी वेदांत का दूसरा विशेष सिद्धांत यह है कि हमें लोगों के धार्मिक विचारों की अनंत विविधता को स्वीकार करना चाहिए और सब को एक ही विचारधारा के अंतर्गत लाने का प्रयास nahi करनी चाहिए क्योंकि लक्ष्य तो एक ही है जैसा कि एक वेदांती अपने काव्य भाषा में कहता है जिस प्रकार बहुत सी नदियां जिन का उद्गम विभिन्न पर्वतों से होता है तेरी या सीधी बैठकर अंत में समुद्र में ही गिरती है
उसी प्रकार यह सभी विभिन्न संप्रदाय जो भिन्न-भिन्न दृष्टि बिंदुओं से प्रकट होते है सीधे या टेढ़ी-मेढ़ी मार्गो से चलते हुए भी अंत का तुम ही को प्राप्त होते हैं यह वेदांत की माहिती शिक्षकों में से एक है यह जानकर कि ज्ञात या अज्ञात रूप से हम सब उसी देखो पहुंचने के लिए संघर्षशील हैं हम दीवाने क्यों hon. यदि एक मनुष्य मंद है तो हमें अधीर नहीं होना चाहिए ना उसे अपशब्द कर ना कहना चाहिए और ना ही उसकी भर्त्सना करनी चाहिए जब हमारा हृदय पवित्र हो जाता है उस दिव्य प्रभाव का कार्य हर मानव के हृदय में प्रस्तुत होता हुआ वह ईश्वरीय उद्बोधन अभिव्यक्त हो जाएga. और तभी हम लोग मातृत्व का दावा करने में समर्थ होंगे जब मनुष्य उच्चतम को प्राप्त कर लेता है और वह ना पुरुष देखता है ना स्त्री लर्निंग ना धर्म नवल नजर ना आए अन्य प्रकार के विवादों को देखता है वल्वा आगे बढ़ता जाता है और उस देवता का अनुभव करता है जो मानव का सत्य स्वरूप है वह मनुष्यों में अंतर्निहित है केवल तभी वह विश्व बंधुत्व को प्राप्त कर लेता है केवल ऐसा ही व्यक्ति वेदांती है
                                      ,---Swami Vivekananda
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Bajrangilal

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